यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मन:। तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि॥ २॥
यत् =जो; अर्चिमत् =दीप्तिमान् है; च=और; यत् =जो; अणुभ्य:=सूक्ष्मोंसे भी; अणु=सूक्ष्म है; यस्मिन्=जिसमें; लोका:=समस्त लोक; च=और; लोकिन:=उन लोकोंमें रहनेवाले प्राणी; निहिता:=स्थित हैं; तत् =वही; एतत् =यह; अक्षरम्=अविनाशी; ब्रह्म=ब्रह्म है; स:=वही; प्राण:=प्राण है; तत् उ=वही; वाक्=वाणी; मन:=(और) मन है; तत् =वही; एतत् =यह; सत्यम्=सत्य है; तत् =वह; अमृतम्=अमृत है; सोम्य=हे प्यारे!; तत् =उस; वेद्धव्यम्=वेधनेयोग्य लक्ष्यको; विद्धि=तू वेध॥ २॥
व्याख्या—जो परब्रह्म परमेश्वर अतिशय देदीप्यमान प्रकाशस्वरूप हैं, जो सूक्ष्मोंसे भी अतिशय सूक्ष्म हैं, जिनमें समस्त लोक और उन लोकोंमें रहनेवाले समस्त प्राणी स्थित हैं अर्थात् ये सब जिनके आश्रित हैं, वे ही परम अक्षर ब्रह्म हैं, वे ही सबके जीवनदाता प्राण हैं, वे ही सबकी वाणी और मन अर्थात् समस्त जगत्के इन्द्रिय और अन्त:करणरूपमें प्रकट हैं। वे ही परम सत्य और अमृत—अविनाशी तत्त्व हैं। प्रिय शौनक! उस वेधनेयोग्य लक्ष्यको तू वेध अर्थात् आगे बताये जानेवाले प्रकारसे साधन करके उसमें तन्मय हो जा॥ २॥
सम्बन्ध—लक्ष्यको वेधनेके लिये धनुष और बाण चाहिये; अत: इस रूपककी पूर्णताके लिये सारी सामग्रीका वर्णन करते हैं—