आवि: संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम्। एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम्॥ १॥ *
* इस मन्त्रसे मिलता हुआ मन्त्र अथर्व० कां० १०। ८। ६ है।
आवि:=(जो) प्रकाशस्वरूप; संनिहितम्=अत्यन्त समीपस्थ; गुहाचरम् नाम=(हृदयरूप गुहामें स्थित होनेके कारण) गुहाचरनामसे प्रसिद्ध; महत् पदम्=(और) महान् पद (परम प्राप्य) है; यत् =जितने भी; एजत् =चेष्टा करनेवाले; प्राणत् =श्वास लेनेवाले; च=और; निमिषत् =आँखोंको खोलने-मूँदनेवाले (प्राणी हैं); एतत् =ये (सब-के-सब); अत्र=इसीमें; समर्पितम्=समर्पित (प्रतिष्ठित) हैं; एतत् =इस परमेश्वरको; जानथ=तुमलोग जानो; यत् =जो; सत् =सत् ; असत् =(और) असत् है; वरेण्यम्=सबके द्वारा वरण करनेयोग्य (और); वरिष्ठम्=अतिशय श्रेष्ठ है (तथा); प्रजानाम्=समस्त प्राणियोंकी; विज्ञानात् =बुद्धिसे; परम्=परे अर्थात् जाननेमें न आनेवाला है॥ १॥
व्याख्या—सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी परमेश्वर प्रकाशस्वरूप हैं। समस्त प्राणियोंके अत्यन्त समीप उन्हींके हृदयरूप गुहामें छिपे रहनेके कारण ही ये गुहाचर नामसे प्रसिद्ध हैं। जितने भी हिलने-चलनेवाले, श्वास लेनेवाले और आँख खोलने-मूँदनेवाले प्राणी हैं, उन सबका समुदाय इन्हीं परमेश्वरमें समर्पित अर्थात् स्थित है। सबके आश्रय ये परमात्मा ही हैं। तुम इनको जानो। ये सत् और असत् अर्थात् कार्य और कारण एवं प्रकट और अप्रकट—सब कुछ हैं। सबके द्वारा वरण करनेयोग्य और अत्यन्त श्रेष्ठ हैं तथा समस्त प्राणियोंकी बुद्धिसे परे अर्थात् बुद्धिद्वारा अज्ञेय हैं॥ १॥
सम्बन्ध—उन्हीं परब्रह्म परमेश्वरका तत्त्व समझानेके लिये पुन: उनके स्वरूपका दूसरे शब्दोंमें वर्णन करते हैं—