ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्॥ ११॥
इदम्=यह; अमृतम्=अमृतस्वरूप; ब्रह्म=परब्रह्म; एव=ही; पुरस्तात् =सामने हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; पश्चात् =पीछे हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; दक्षिणत:=दायीं ओर; च=तथा; उत्तरेण=बायीं ओर; अध:=नीचेकी ओर; च=तथा; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; च=भी; प्रसृतम्=फैला हुआ है; इदम् [यत्]=यह जो; विश्वम्=सम्पूर्ण जगत् है; इदम्=यह; वरिष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही है॥ ११॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताका प्रतिपादन किया गया है। सारांश यह कि ये अमृतस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही आगे-पीछे, दायें-बायें, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे—सर्वत्र फैले हुए हैं; इस विश्वब्रह्माण्डके रूपमें ये सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही प्रत्यक्ष दिखायी दे रहे हैं॥ ११॥