न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्नि:।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥ १०॥ *
* यह मन्त्र कठोपनिषद् (२। २। १५) में और श्वेता० उ० (६। १४) में भी है।
तत्र=वहाँ; न=न (तो); सूर्य:=सूर्य; भाति=प्रकाशित होता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागण ही; न=(तथा) न; इमा:=ये; विद्युत:= बिजलियाँ ही; भान्ति=(वहाँ) चमकती हैं; अयम् अग्नि: कुत:=फिर इस अग्निके लिये तो कहना ही क्या है; तम् भान्तम् एव=(क्योंकि) उसके प्रकाशित होनेपर ही; सर्वम्=सब; अनुभाति=उसके पीछे उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसीके; भासा=प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत् ; विभाति=प्रकाशित होता है॥ १०॥
व्याख्या—उन स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते; फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है। क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उन परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश-शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं। वे अपने प्रकाशके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं? सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक क्षुद्रतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है॥ १०॥