तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूता:
साध्या मनुष्या: पशवो वयांसि।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च
श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च॥ ७॥
च=तथा; तस्मात् =उसी परमेश्वरसे; बहुधा=अनेक भेदोंवाले; देवा:=देवतालोग; सम्प्रसूता:=उत्पन्न हुए; साध्या:=साध्यगण; मनुष्या:=मनुष्य; पशव: वयांसि=पशु-पक्षी; प्राणापानौ=प्राण-अपानवायु; व्रीहियवौ=धान, जौ आदि अन्न; च=तथा; तप:=तप; श्रद्धा=श्रद्धा; सत्यम्=सत्य (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य; च=एवं; विधि:=यज्ञ आदिके अनुष्ठानकी विधि भी; [एते सम्प्रसूता:]=ये सब-के-सब उत्पन्न हुए हैं॥ ७॥
व्याख्या—उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही वसु, रुद्र आदि अनेक भेदोंवाले देवतालोग उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे साध्यगण, नाना प्रकारके मनुष्य, विभिन्न जातियोंके पशु, विविध भाँतिके पक्षी और अन्य सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं। सबके जीवनरूप प्राण और अपान तथा सब प्राणियोंके आहाररूप धान, जौ आदि अनेक प्रकारके अन्न भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे तप, श्रद्धा, सत्य और ब्रह्मचर्य प्रकट हुए हैं तथा यज्ञादि कर्म करनेकी विधि भी उन परमेश्वरसे ही प्रकट हुई है। तात्पर्य यह कि सब कुछ उन्हींसे उत्पन्न हुआ है। वे ही सबके परम कारण हैं॥ ७॥