तस्मादृच: साम यजूंषि दीक्षा
यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च।
संवत्सरश्च यजमानश्च लोका:
सोमो यत्र पवते यत्र सूर्य:॥ ६॥
तस्मात् =उस परमेश्वरसे ही; ऋच:=ऋग्वेदकी ऋचाएँ; साम=सामवेदके मन्त्र; यजूंषि=यजुर्वेदकी श्रुतियाँ; (और) दीक्षा=दीक्षा; च=तथा; सर्वे=समस्त; यज्ञा:=यज्ञ; क्रतव:=क्रतु; च=एवं; दक्षिणा:=दक्षिणाएँ; च=तथा; संवत्सर:=संवत्सररूप काल; यजमान:=यजमान; च=और; लोका:=सब लोक (उत्पन्न हुए हैं); यत्र=जहाँ; सोम:=चन्द्रमा; पवते=प्रकाश फैलाता है (और); यत्र=जहाँ; सूर्य:=सूर्य; [पवते]=प्रकाश देता है॥ ६॥
व्याख्या—उन परमेश्वरसे ही ऋग्वेदकी ऋचाएँ, सामवेदके मन्त्र और यजुर्वेदकी श्रुतियाँ एवं यज्ञादि कर्मोंकी दीक्षा*, सब प्रकारके यज्ञ और क्रतु,* उनमें दी जानेवाली दक्षिणाएँ, जिसमें वे किये जाते हैं—वह संवत्सररूप काल, उनको करनेका अधिकारी यजमान, उनके फलस्वरूप वे सब लोक, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाश फैलाते हैं—ये सब उत्पन्न हुए हैं॥ ६॥
* शास्त्रविधिके अनुसार किसी यज्ञका आरम्भ करते समय यजमान जो संकल्पके साथ उसके अनुष्ठानसम्बन्धी नियमोंके पालनका व्रत लेता है, उसका नाम ‘दीक्षा’ है।
* यज्ञ और क्रतु—ये यज्ञके ही दो भेद हैं। जिन यज्ञोंमें यूप बनानेकी विधि है, उन्हें ‘क्रतु’ कहते हैं।
सम्बन्ध—अब देवादि समस्त प्राणियोंके भेद और सब प्रकारके सदाचार भी उन्हीं ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, यह बतलाते हैं—