तस्मादग्नि: समिधो यस्य सूर्य:
सोमात्पर्जन्य ओषधय: पृथिव्याम्।
पुमान् रेत: सिञ्चति योषितायां
बह्वी: प्रजा: पुरुषात् सम्प्रसूता:॥ ५॥
तस्मात्=उससे ही; अग्नि:=अग्निदेव प्रकट हुआ; यस्य समिध:=जिसकी समिधा; सूर्य:=सूर्य है; (उस अग्निसे सोम उत्पन्न हुआ) सोमात्=सोमसे; पर्जन्य:=मेघ उत्पन्न हुए (और मेघोंसे वर्षाद्वारा); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधय:=नाना प्रकारकी ओषधियाँ (उत्पन्न हुईं); रेत:=(ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए) वीर्यको; पुमान्=पुरुष; योषितायाम्=स्त्रीमें; सिञ्चति=सिंचन करता है (जिससे संतान उत्पन्न होती है); [एवम्]=इस प्रकार; पुरुषात् =उस परम पुरुषसे ही; बह्वी: प्रजा:=नाना प्रकारके चराचर प्राणी; सम्प्रसूता:=नियमपूर्वक उत्पन्न हुए हैं॥ ५॥
व्याख्या—जब-जब परमेश्वरसे यह जगत् उत्पन्न होता है तब-तब सदैव एक प्रकारसे ही होता हो—ऐसा नियम नहीं है। वे जब जैसा संकल्प करते हैं, उसी प्रकार उसी क्रमसे जगत् उत्पन्न हो जाता है। इसी भावको प्रकट करनेके लिये यहाँ प्रकारान्तरसे सृष्टिकी उत्पत्ति बतलायी गयी है। मन्त्रका सारांश यह है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमसे सर्वप्रथम तो उनकी अचिन्त्य शक्तिका एक अंश अद्भुत अग्नितत्त्व उत्पन्न हुआ, जिसकी समिधा (ईंधन) सूर्य है, अर्थात् जो सूर्यबिम्बके रूपमें प्रज्वलित रहती है; अग्निसे चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, चन्द्रमासे (सूर्यकी रश्मियोंमें सूक्ष्मरूपसे स्थित जलमें कुछ शीतलता आ जानेके कारण) मेघ उत्पन्न हुए। मेघोंसे वर्षाद्वारा पृथ्वीमें नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। उन ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए वीर्यको जब पुरुष अपनी जातिकी स्त्रीमें सिंचन करता है, तब उससे संतान उत्पन्न होती है। इस प्रकार परमपुरुष परमेश्वरसे ये नाना प्रकारके चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं॥ ५॥
सम्बन्ध—इस प्रकार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका क्रम बतलाकर अब यह बात बतायी जाती है कि उन सबकी रक्षाके लिये किये जानेवाले यज्ञादि, उनके साधन और फल भी उन्हीं परमेश्वरसे प्रकट होते हैं—