एतस्माज्जायते प्राणो मन: सर्वेन्द्रियाणि च।
खं वायुर्ज्योतिराप: पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥ ३॥
एतस्मात्=इसी परमेश्वरसे; प्राण:=प्राण; जायते=उत्पन्न होता है (तथा); मन:=मन (अन्त:करण); सर्वेन्द्रियाणि=समस्त इन्द्रियाँ, खम्=आकाश; वायु:=वायु; ज्योति:=तेज; आप:=जल; च=और; विश्वस्य धारिणी=सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली; पृथिवी=पृथ्वी (ये सब उत्पन्न होते हैं)॥ ३॥
व्याख्या—यद्यपि वे परब्रह्म पुरुषोत्तम निराकार और मन, इन्द्रिय आदि करण-समुदायसे सर्वथा रहित हैं, तथापि सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। इन सर्व-शक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमसे ही सृष्टिकालमें प्राण, मन (अन्त:करण) और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वी—ये पाँचों महाभूत, सब-के-सब उत्पन्न होते हैं॥ ३॥
सम्बन्ध—इस प्रकार संक्षेपमें परमेश्वरसे सूक्ष्म तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बतलाकर अब इस जगत्में भगवान्का विराट् रूप देखनेका प्रकार बतलाते हैं—