दिव्यो ह्यमूर्त: पुरुष: सबाह्याभ्यन्तरो ह्यज:।
अप्राणो ह्यमना: शुभ्रो ह्यक्षरात् परत: पर:॥ २॥
हि=निश्चय ही; दिव्य:=दिव्य; पुरुष:=पूर्णपुरुष; अमूर्त:=आकाररहित; सबाह्याभ्यन्तर: हि=समस्त जगत्के बाहर और भीतर भी व्याप्त; अज:=जन्मादि विकारोंसे अतीत; अप्राण:=प्राणरहित; अमना:=मनरहित; हि=होनेके कारण; शुभ्र:=सर्वथा विशुद्ध है (तथा); हि=इसीलिये; अक्षरात् =अविनाशी जीवात्मासे; परत: पर:=अत्यन्त श्रेष्ठ है॥ २॥
व्याख्या—वे दिव्य पुरुष परमात्मा नि:संदेह आकाररहित और समस्त जगत्के बाहर एवं भीतर भी परिपूर्ण हैं। वे जन्म आदि विकारोंसे रहित, सर्वथा विशुद्ध हैं; क्योंकि उनके न तो प्राण हैं, न इन्द्रियाँ हैं और न मन ही है। वे इन सबके बिना ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं; इसीलिये वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अविनाशी जीवात्मासे अत्यन्त श्रेष्ठ—सर्वथा उत्तम हैं॥ २॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त लक्षणोंवाले निराकार परमेश्वरसे यह साकार जगत् किस प्रकार उत्पन्न हो जाता है, इस जिज्ञासापर उनकी सर्वशक्तिमत्ताका वर्णन करते हैं—