सम्बन्ध—प्रथम मुण्डकके द्वितीय खण्डमें अपर विद्याका स्वरूप और फल बतलाया तथा उसकी तुच्छता दिखाते हुए उससे विरक्त होनेकी बात कहकर परविद्या प्राप्त करनेके लिये सद्गुरुकी शरणमें जानेको कहा। अब परविद्याका वर्णन करनेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं—
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुलिङ्गा:
सहस्रश: प्रभवन्ते सरूपा:।
तथाक्षराद् विविधा: सोम्य भावा:
प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति॥ १॥
सोम्य=हे प्रिय!; तत् =वह; सत्यम्=सत्य; एतत् =यह है; यथा=जिस प्रकार; सुदीप्तात् पावकात् =प्रज्वलित अग्निमेंसे; सरूपा:=उसीके समान रूपवाली; सहस्रश:=हजारों; विस्फुलिङ्गा:=चिनगारियाँ; प्रभवन्ते=नाना प्रकारसे प्रकट होती हैं; तथा=उसी प्रकार; अक्षरात् =अविनाशी ब्रह्मसे; विविधा:=नाना प्रकारके; भावा:=भाव; प्रजायन्ते=उत्पन्न होते हैं; च=और; तत्र एव=उसीमें; अपियन्ति=विलीन हो जाते हैं*॥ १॥
* प्रथम मुण्डकके प्रथम खण्डके सातवें मन्त्रमें मकड़ी, पृथ्वी और मनुष्य-शरीरके दृष्टान्तसे जो बात कही थी, वही बात इस मन्त्रमें अग्निके दृष्टान्तसे समझायी गयी है।
व्याख्या—महर्षि अङ्गिरा कहते हैं—प्रिय शौनक! मैंने तुमको पहले परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए (पूर्व प्रकरणके पहले खण्डमें छठे मन्त्रसे नवेंतक) जो रहस्य बतलाया था, वह सर्वथा सत्य है; अब उसीको पुन: समझाता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निमेंसे उसीके-जैसे रूप-रंगवाली हजारों चिनगारियाँ चारों ओर निकलती हैं, उसी प्रकार परमपुरुष अविनाशी ब्रह्मसे सृष्टिकालमें नाना प्रकारके भाव मूर्त-अमूर्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुन: उन्हींमें लीन हो जाते हैं। यहाँ भावोंके प्रकट होनेकी बात समझानेके लिये ही अग्नि और चिनगारियोंका दृष्टान्त दिया गया है। उनके विलीन होनेकी बात दृष्टान्तसे स्पष्ट नहीं होती॥ १॥
सम्बन्ध—जिन परब्रह्म अविनाशी पुरुषोत्तमसे यह जगत् उत्पन्न होकर पुन: उन्हींमें विलीन हो जाता है, वे स्वयं कैसे हैं—इस जिज्ञासापर कहते हैं—