अविद्यायां बहुधा वर्तमाना
वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बाला:।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्
तेनातुरा: क्षीणलोकाश्चॺवन्ते॥ ९॥
बाला:=वे मूर्खलोग; अविद्यायाम्=उपासनारहित सकाम कर्मोंमें; बहुधा=बहुत प्रकारसे; वर्तमाना:=वर्तते हुए; वयम्=हम; कृतार्था:=कृतार्थ हो गये; इति अभिमन्यन्ति=ऐसा अभिमान कर लेते हैं; यत् =क्योंकि; कर्मिण:= वे सकाम कर्म करनेवाले लोग; रागात् =विषयोंकी आसक्तिके कारण; न प्रवेदयन्ति=कल्याणके मार्गको नहीं जान पाते; तेन=इस कारण; आतुरा:=बारम्बार दु:खसे आतुर हो; क्षीणलोका:=पुण्योपार्जित लोकोंसे हटाये जाकर; च्यवन्ते=नीचे गिर जाते हैं॥ ९॥
व्याख्या—पूर्वमन्त्रमें कहे हुए प्रकारसे जो इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये सांसारिक उन्नतिके साधनरूप नाना प्रकारके सकाम कर्मोंमें ही बहुत प्रकारसे लगे रहते हैं, वे अविद्यामें निमग्न अज्ञानी मनुष्य समझते हैं कि ‘हमने अपने कर्तव्यका पालन कर लिया।’ उन सांसारिक कर्मोंमें लगे हुए मनुष्योंकी भोगोंमें अत्यन्त आसक्ति होती है, इस कारण वे सांसारिक उन्नतिके सिवा कल्याणकी ओर दृष्टि ही नहीं डालते। उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि परमानन्दके समुद्र कोई परमात्मा हैं और मनुष्य उन्हें पा सकता है। इसलिये वे उन परमेश्वरकी प्राप्तिके लिये चेष्टा न करके बारम्बार दु:खी होते रहते हैं और पुण्यकर्मोंका फल पूरा होनेपर वे स्वर्गादि लोकोंसे नीचे गिर जाते हैं॥ ९॥
सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातको ही और भी स्पष्ट करते हैं—