अविद्यायामन्तरे वर्तमाना:
स्वयंधीरा: पण्डितं मन्यमाना:।
जङ्घन्यमाना: परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा:॥ ८॥
अविद्यायाम् अन्तरे=अविद्याके भीतर; वर्तमाना:=स्थित होकर (भी); स्वयंधीरा:=अपने-आप बुद्धिमान् बननेवाले (और); पण्डितम् मन्यमाना:=अपनेको विद्वान् माननेवाले; मूढा:=वे मूर्खलोग; जङ्घन्यमाना:=बार-बार आघात (कष्ट) सहन करते हुए; परियन्ति=(ठीक वैसे ही) भटकते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव=अंधेके द्वारा ही; नीयमाना:=चलाये जानेवाले; अन्धा:=अंधे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर बीचमें ही इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते रहते हैं)॥ ८॥ *
* यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी आया है (क० उ० १। २। ५)।
व्याख्या—जब अंधे मनुष्यको मार्ग दिखानेवाला भी अंधा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और काँटें-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उन मूर्खोंको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दु:खपूर्ण योनियोंमें एवं नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझते हैं; विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंका भोग करनेमें तथा उनके उपायभूत अविद्यामय सकाम कर्मोंमें ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं॥ ८॥
सम्बन्ध—वे लोग बारम्बार दु:खोंमें पड़कर भी चेतते क्यों नहीं, कल्याणके लिये चेष्टा क्यों नहीं करते, इस जिज्ञासापर कहते हैं—