एह्येहीति तमाहुतय: सुवर्चस:
सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य
एष व: पुण्य: सुकृतो ब्रह्मलोक:॥ ६॥
सुवर्चस:=(वे) देदीप्यमान; आहुतय:=आहुतियाँ; एहि एहि=आओ, आओ; एष:=यह; व:=तुम्हारे; सुकृत:=शुभकर्मोंसे प्राप्त; पुण्य:=पवित्र; ब्रह्मलोक:=ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है; इति=इस प्रकारकी; प्रियाम्=प्रिय; वाचम्=वाणी; अभिवदन्त्य:=बार-बार कहती हुई (और); अर्चयन्त्य:=उसका आदर-सत्कार करती हुई; तम्=उस; यजमानम्=यजमानको; सूर्यस्य=सूर्यकी; रश्मिभि:=रश्मियोंद्वारा; वहन्ति=ले जाती हैं॥ ६॥
व्याख्या—उन प्रदीप्त ज्वालाओंमें दी हुई आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके रूपमें परिणत होकर मरणकालमें उस साधकसे कहती हैं—‘आओ, आओ यह तुम्हारे शुभकर्मोंका फलस्वरूप ब्रह्मलोक अर्थात् भोगरूप सुखोंको भोगनेका स्थान स्वर्गलोक है।’ इस प्रकारकी प्रिय वाणी बार-बार कहती हुई आदर-सत्कारपूर्वक उसे सूर्यकी किरणोंके मार्गसे ले जाकर स्वर्गलोकमें पहुँचा देती हैं। यहाँ स्वर्गको ब्रह्मलोक कहनेका यह भाव मालूम होता है कि स्वर्गके अधिपति इन्द्र भी भगवान्के ही अपर स्वरूप हैं, अत: प्रकारान्तरसे ब्रह्म ही हैं॥ ६॥
सम्बन्ध—अब सांसारिक भोगोंमें वैराग्यकी और परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा उत्पन्न करनेके लिये उपर्युक्त स्वर्गलोकके साधनरूप यज्ञादि सकाम कर्म और उनके फलरूप लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंकी तुच्छता बतलाते हैं—