यदा लेलायते ह्यर्चि: समिद्धे हव्यवाहने।
तदाज्यभागावन्तरेणाहुती: प्रतिपादयेत्॥ २॥
यदा हि=जिस समय; हव्यवाहने समिद्धे=हविष्यको देवताओंके पास पहुँचानेवाली अग्निके प्रदीप्त हो जानेपर; अर्चि:=(उसमें) ज्वालाएँ; लेलायते=लपलपाने लगती हैं; तदा=उस समय; आज्यभागौ अन्तरेण=आज्यभागकी दोनों आहुतियोंके* स्थानको छोड़कर बीचमें; आहुती:=अन्य आहुतियोंको; प्रतिपादयेत् =डाले॥ २॥
* यजुर्वेदके अनुसार प्रजापतिके लिये मौनभावसे एक आहुति और इन्द्रके लिये ‘आधार’ नामकी दो घृताहुतियाँ देनेके पश्चात् जो अग्नि और सोम देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् दो आहुतियाँ दी जाती हैं उनका नाम ‘आज्यभाग’ है। ‘ॐ अग्नये स्वाहा’ कहकर उत्तर-पूर्वार्धमें और ‘ॐ सोमाय स्वाहा’ कहकर दक्षिण-पूर्वार्धमें ये आहुतियाँ डाली जाती हैं, इनके बीचमें शेष आहुतियाँ डालनी चाहिये।
व्याख्या—अधिकारी मनुष्योंको नित्यप्रति अग्निहोत्र करना चाहिये। जब देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाली अग्नि अग्निहोत्रकी वेदीमें भलीभाँति प्रज्वलित हो जाय, उसमेंसे लपटें निकलने लगें, उस समय आज्यभागके स्थानको छोड़कर मध्यमें आहुतियाँ डालनी चाहिये। इससे यह बात भी समझायी गयी है कि जबतक अग्नि प्रदीप्त न हो, उसमेंसे लपटें न निकलने लगें तबतक या निकलकर शान्त हो जायँ, उस समय अग्निमें आहुति नहीं डालनी चाहिये। अग्निको अच्छी तरह प्रज्वलित करके ही अग्निहोत्र करना चाहिये॥ २॥
सम्बन्ध—नित्य अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यको उसके साथ-साथ और क्या-क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—