तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक्
प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं
प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्॥ १३॥
स:=वह; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; उपसन्नाय=शरणमें आये हुए; सम्यक्प्रशान्तचित्ताय=पूर्णतया शान्तचित्तवाले; शमान्विताय=शम-दमादि साधनयुक्त; तस्मै=उस शिष्यको; ताम् ब्रह्मविद्याम्=उस ब्रह्मविद्याका; तत्त्वत:=तत्त्व-विवेचनपूर्वक; प्रोवाच=भलीभाँति उपदेश करे; येन [स:]=जिससे वह शिष्य; अक्षरम्=अविनाशी; सत्यम्=नित्य; पुरुषम्=परम पुरुषको; वेद=जान ले॥ १३॥
व्याख्या—उन श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महात्माको भी चाहिये कि अपनी शरणमें आये हुए ऐसे शिष्यको, जिसका चित्त पूर्णतया शान्त—निश्चिन्त हो चुका हो, सांसारिक भोगोंमें सर्वथा वैराग्य हो जानेके कारण जिसके चित्तमें किसी प्रकारकी चिन्ता, व्याकुलता या विकार नहीं रह गये हों, जो शम-दमादि साधनसम्पन्न हो अर्थात् जिसने अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें कर लिया हो, उस ब्रह्मविद्याका तत्त्व-विवेचनपूर्वक भलीभाँति समझाकर उपदेश करे, जिससे वह शिष्य नित्य अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमका ज्ञान प्राप्त कर सके॥ १३॥