परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो
निर्वेदमायान्नास्त्यकृत: कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ १२॥
कर्मचितान्=कर्मसे प्राप्त किये जानेवाले; लोकान् परीक्ष्य=लोकोंकी परीक्षा करके; ब्राह्मण:=ब्राह्मण; निर्वेदम्=वैराग्यको; आयात्=प्राप्त हो जाय (यह समझ ले कि); कृतेन=किये जानेवाले कर्मोंसे; अकृत:=स्वत:सिद्ध नित्य परमेश्वर; न अस्ति=नहीं मिल सकता; स:=वह; तद्विज्ञानार्थम्=उस परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये; समित्पाणि:=हाथमें समिधा लेकर; श्रोत्रियम्=वेदको भलीभाँति जाननेवाले (और); ब्रह्मनिष्ठम्=परब्रह्म परमात्मामें स्थित; गुरुम्=गुरुके पास; एव=ही; अभिगच्छेत्=विनयपूर्वक जाय॥ १२॥
व्याख्या—अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले बतलाये हुए सकाम कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके समस्त सांसारिक सुखोंकी भलीभाँति परीक्षा करके अर्थात् विवेकपूर्वक उनकी अनित्यता और दु:खरूपताको समझकर सब प्रकारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये। यह निश्चय कर लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानपूर्वक सकामभावसे किये जानेवाले कर्म अनित्य फलको देनेवाले तथा स्वयं भी अनित्य हैं। अत: जो सर्वथा अकृत है अर्थात् क्रियासाध्य नहीं है, ऐसे नित्य परमेश्वरकी प्राप्ति वे नहीं करा सकते। यह सोचकर उस जिज्ञासुको परमात्माका वास्तविक तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये हाथमें समिधा लेकर श्रद्धा और विनयभावके सहित ऐसे सद्गुुरुकी शरणमें जाना चाहिये, जो वेदोंके रहस्यको भलीभाँति जानते हों और परब्रह्म परमात्मामें स्थित हों॥ १२॥
सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाला कोई शिष्य यदि गुरुके पास आ जाय तो गुरुको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—