तप:श्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये
शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्त:।
सूर्यद्वारेण ते विरजा: प्रयान्ति
यत्रामृत: स पुरुषो ह्यव्ययात्मा॥ ११॥
हि=किंतु; ये=जो; अरण्ये [स्थिता:]=वनमें रहनेवाले; शान्ता:= शान्तस्वभाववाले; विद्वांस:=विद्वान्; भैक्ष्यचर्याम् चरन्त:=तथा भिक्षाके लिये विचरनेवाले; तप:श्रद्धे=संयमरूप तप तथा श्रद्धाका; उपवसन्ति=सेवन करते हैं; ते=वे; विरजा:=रजोगुणरहित; सूर्यद्वारेण=सूर्यके मार्गसे; [तत्र] प्रयान्ति=वहाँ चले जाते हैं; यत्र हि=जहाँपर; स:=वह; अमृत:=जन्म-मृत्युसे रहित; अव्ययात्मा=नित्य, अविनाशी; पुरुष:=परम पुरुष (रहता है)॥ ११॥
व्याख्या—उपर्युक्त भोगासक्त मनुष्योंसे जो सर्वथा भिन्न हैं, मनुष्य-शरीरका महत्त्व समझ लेनेके कारण जिनके अन्त:करणमें परमात्माका तत्त्व जाननेकी और परमेश्वरको प्राप्त करनेकी इच्छा जग उठी है, वे चाहे वनमें निवास करनेवाले वानप्रस्थ हों, शान्त स्वभाववाले विद्वान् सदाचारी गृहस्थ हों या भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी अथवा संन्यासी हों, वे तो निरन्तर तप और श्रद्धाका ही सेवन किया करते हैं, अर्थात् अपने-अपने वर्ण, आश्रम तथा परिस्थितिके अनुसार जिस समय जो कर्तव्य होता है, उसका शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बिना किसी प्रकारकी कामनाके पालन करते रहते हैं और संयमपूर्वक शम-दमादि साधनोंसे सम्पन्न होकर परम श्रद्धाके साथ परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके साधनोंमें लगे रहते हैं। इसलिये तम और रजोगुणके विकारोंसे सर्वथा शून्य निर्मल सत्त्वगुणमें स्थित वे सज्जन सूर्यलोकमें होते हुए वहाँ चले जाते हैं, जहाँ उनके परम प्राप्त अमृतस्वरूप नित्य अविनाशी परमपुरुष पुरुषोत्तम निवास करते हैं॥ ११॥
सम्बन्ध—उन परब्रह्म परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—