इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढा:।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं
लोकं हीनतरं वा विशन्ति॥ १०॥
इष्टापूर्तम्=इष्ट और पूर्त* (सकाम) कर्मोंको ही; वरिष्ठम्=श्रेष्ठ; मन्यमाना:=माननेवाले; प्रमूढा:=अत्यन्त मूर्खलोग; अन्यत् =उससे भिन्न; श्रेय:=वास्तविक श्रेयको; न वेदयन्ते=नहीं जानते; ते=वे; सुकृते=पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप; नाकस्य पृष्ठे=स्वर्गके उच्चतम स्थानमें; अनुभूत्वा=(जाकर श्रेष्ठ कर्मोंके फलस्वरूप) वहाँके भोगोंका अनुभव करके; इमम् लोकम्=इस मनुष्यलोकमें; वा=अथवा; हीनतरम्=इससे भी अत्यन्त हीन योनियोंमें; विशन्ति=प्रवेश करते हैं॥ १०॥
* यज्ञ-यागादि श्रौतकर्मोंको ‘इष्ट’ तथा बावली, कुआँ खुदवाना और बगीचे आदि लगाना स्मृतिविहित कर्मको ‘पूर्त’ कहते हैं।
व्याख्या—वे अतिशय मूर्ख भोगासक्त मनुष्य इष्ट और पूर्तको अर्थात् वेद और स्मृति आदि शास्त्रोंमें सांसारिक सुखोंकी प्राप्तिके जितने भी साधन बताये गये हैं, उन्हींको सर्वश्रेष्ठ कल्याण-साधन मानते हैं। इसलिये उनसे भिन्न अर्थात् परमेश्वरका भजन, ध्यान और निष्कामभावसे कर्तव्यपालन करना एवं परमपुरुष परमात्माको जाननेके लिये तीव्र जिज्ञासापूर्वक चेष्टा करना आदि जितने भी परम कल्याणके साधन हैं, उन्हें वे नहीं जानते, उन कल्याण-साधनोंकी ओर लक्ष्यतक नहीं करते। अत: वे अपने पुण्यकर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकतकके सुखोंको भोगकर पुण्य क्षय होनेपर पुन: इस मनुष्यलोकमें अथवा इससे भी नीची शूकर-कूकर, कीट-पतङ्ग आदि योनियोंमें या रौरवादि घोर नरकोंमें चले जाते हैं। (गीता ९। २०-२१)॥ १०॥
सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन करते हैं—