तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते।
अन्नात्प्राणो मन: सत्यं लोका: कर्मसु चामृतम्॥ ८॥
ब्रह्म=परब्रह्म; तपसा=संकल्परूप तपसे; चीयते=उपचय (वृद्धि) को प्राप्त होता है; तत:=उससे; अन्नम्=अन्न; अभिजायते=उत्पन्न होता है; अन्नात् =अन्नसे (क्रमश:); प्राण:=प्राण; मन:=मन; सत्यम्=सत्य (पाँच महाभूत); लोका:=समस्त लोक (और कर्म); च=तथा; कर्मसु=कर्मोंसे; अमृतम्=अवश्यम्भावी सुख-दु:खरूप फल उत्पन्न होता है॥ ८॥
व्याख्या—जब जगत्की रचनाका समय आता है, उस समय परब्रह्म परमेश्वर अपने संकल्परूप तपसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं, अर्थात् उनमें विविध रूपोंवाली सृष्टिके निर्माणका संकल्प उठता है। जीवोंके कर्मानुसार उन परब्रह्म पुरुषोत्तममें जो सृष्टिके आदिमें स्फुरणा होती है, वही मानो उनका तप है; उस स्फुरणाके होते ही भगवान्, जो पहले अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें रहते हैं, (जिसका वर्णन छठे मन्त्रमें आ चुका है) उसकी अपेक्षा स्थूल हो जाते हैं अर्थात् वे सृष्टिकर्ता ब्रह्माका रूप धारण कर लेते हैं। ब्रह्मासे सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाला अन्न उत्पन्न होता है। फिर अन्नसे क्रमश: प्राण, मन, कार्यरूप आकाशादि पाँच महाभूत, समस्त प्राणी और उनके वासस्थान, उनके भिन्न-भिन्न कर्म और उन कर्मोंसे उनका अवश्यम्भावी सुख-दु:खरूप फल—इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है॥ ८॥
सम्बन्ध—अब परमेश्वरकी महिमाका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—