यथोर्णनाभि: सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधय: सम्भवन्ति।
यथा सत: पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्॥ ७॥
यथा=जिस प्रकार; ऊर्णनाभि:=मकड़ी; सृजते=(जालेको) बनाती है; च=और; गृह्णते=निगल जाती है (तथा); यथा=जिस प्रकार; पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधय:=नाना प्रकारकी ओषधियाँ; सम्भवन्ति=उत्पन्न होती हैं (और); यथा=जिस प्रकार; सत: पुरुषात् =जीवित मनुष्यसे; केशलोमानि=केश और रोएँ (उत्पन्न होते हैं); तथा=उसी प्रकार; अक्षरात् =अविनाशी परब्रह्मसे; इह=यहाँ (इस सृष्टिमें); विश्वम्=सब कुछ; सम्भवति=उत्पन्न होता है॥ ७॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें तीन दृष्टान्तोंद्वारा यह बात समझायी गयी है कि परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्के निमित्त और उपादान कारण हैं। पहले मकड़ीके दृष्टान्तसे यह बात कही गयी है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने पेटमें स्थित जालेको बाहर निकालकर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमेश्वर अपने अंदर सूक्ष्मरूपसे लीन हुए जड-चेतनरूप जगत्को सृष्टिके आरम्भमें नाना प्रकारसे उत्पन्न करके फैलाते हैं और प्रलयकालमें पुन: उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं (गीता ९। ७-८)। दूसरे उदाहरणसे यह बात समझायी है कि जिस प्रकार पृथ्वीमें जैसे-जैसे अन्न, तृण, वृक्ष, लता आदि ओषधियोंके बीज पड़ते हैं, उसी प्रकारकी भिन्न-भिन्न भेदोंवाली ओषधियाँ वहाँ उत्पन्न हो जाती हैं—उसमें पृथ्वीका कोई पक्षपात नहीं है, उसी प्रकार जीवोंके विभिन्न कर्मरूप बीजोंके अनुसार ही भगवान् उनको भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, अत: उनमें किसी प्रकारकी विषमता और निर्दयताका दोष नहीं है (ब्रह्मसूत्र २।१।३४)। तीसरे मनुष्य-शरीरके उदाहरणसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार मनुष्यके जीवित शरीरसे सर्वथा विलक्षण केश, रोएँ और नख अपने-आप उत्पन्न होते और बढ़ते रहते हैं—उसके लिये उसको कोई कार्य नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार परब्रह्म परमेश्वरसे यह जगत् स्वभावसे ही समयपर उत्पन्न हो जाता है और विस्तारको प्राप्त होता है; इसके लिये भगवान्को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, इसीलिये भगवान्ने गीतामें कहा है कि ‘मैं इस जगत्को बनानेवाला होनेपर भी अकर्ता ही हूँ’ (४। १३), ‘उदासीनकी तरह स्थित रहनेवाला मुझ परमेश्वरको वे कर्म लिप्त नहीं करते’ (९। ९) इत्यादि॥ ७॥
सम्बन्ध—अब संक्षेपमें जगत्की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं—