तस्मै स होवाच। द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च॥ ४॥
तस्मै=उन शौनक मुनिसे; स: ह=वे विख्यात महर्षि अङ्गिरा; उवाच=बोले; ब्रह्मविद:=ब्रह्मको जाननेवाले; इति=इस प्रकार; ह=निश्चयपूर्वक; वदन्ति स्म यत् =कहते आये हैं कि; द्वे विद्ये=दो विद्याएँ; एव=ही; वेदितव्ये=जाननेयोग्य हैं; परा=एक परा; च=और; अपरा=दूसरी अपरा; च=भी॥ ४॥
व्याख्या—इस प्रकार शौनकके पूछनेपर महर्षि अङ्गिरा बोले—‘शौनक! ब्रह्मको जाननेवाले महर्षियोंका कहना है कि मनुष्यके लिये जाननेयोग्य दो विद्याएँ हैं—एक तो परा और दूसरी अपरा॥ ४॥