शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्न: पप्रच्छ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति॥ ३॥
ह=विख्यात है (कि); शौनक: वै=शौनक नामसे प्रसिद्ध मुनि; महाशाल:=जो अति बृहत् विद्यालय (ऋषिकुल) के अधिष्ठाता थे; विधिवत्=शास्त्रविधिके अनुसार; अङ्गिरसम् उपसन्न:=महर्षि अङ्गिराके पास आये (और उनसे); पप्रच्छ= (विनयपूर्वक) पूछा; भगव:=भगवन्!; नु=निश्चयपूर्वक; कस्मिन् विज्ञाते=किसके जान लिये जानेपर; इदम्=यह; सर्वम्=सब कुछ; विज्ञातम्=जाना हुआ; भवति=हो जाता है; इति=यह (मेरा प्रश्न है)॥ ३॥
व्याख्या—शौनक नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे, जो बड़े भारी विश्वविद्यालयके अधिष्ठाता थे; पुराणोंके अनुसार उनके ऋषिकुलमें अट्ठासी हजार ऋषि रहते थे। वे उपर्युक्त ब्रह्मविद्याको जाननेके लिये शास्त्रविधिके अनुसार हाथमें समिधा लेकर श्रद्धापूर्वक महर्षि अङ्गिराके पास आये। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—‘भगवन्! जिसको भलीभाँति जान लेनेपर यह जो कुछ देखने, सुनने और अनुमान करनेमें आता है, सब-का-सब जान लिया जाता है, वह परम तत्त्व क्या है? कृपया बतलाइये कि उसे कैसे जाना जाय?॥ ३॥