ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथम: सम्बभूव
विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा-
मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह॥ १॥
‘ॐ’ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। इसके द्वारा यहाँ यह सूचित किया गया है कि मनुष्यको प्रत्येक कार्यके आरम्भमें ईश्वरका स्मरण तथा उनके नामका उच्चारण अवश्य करना चाहिये।
विश्वस्य कर्ता=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता (और); भुवनस्य गोप्ता=सब लोकोंकी रक्षा करनेवाले; ब्रह्मा=(चतुर्मुख) ब्रह्माजी; देवानाम्=सब देवताओंमें; प्रथम:=पहले; सम्बभूव=प्रकट हुए; स:=उन्होंने; ज्येष्ठपुत्राय अथर्वाय=सबसे बड़े पुत्र अथर्वाको; सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्=समस्त विद्याओंकी आधारभूता; ब्रह्मविद्याम् प्राह=ब्रह्मविद्याका भलीभाँति उपदेश किया॥ १॥
व्याख्या—सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे देवताओंमें सर्वप्रथम ब्रह्मा प्रकट हुए। फिर इन्होंने ही सब देवताओं, महर्षियों और मरीचि आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया। साथ ही, समस्त लोकोंकी रचना भी की तथा उन सबकी रक्षाके सुदृढ़ नियम आदि बनाये। उनके सबसे बड़े पुत्र महर्षि अथर्वा थे; उन्हींको सबसे पहले ब्रह्माजीने ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था। जिस विद्यासे ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका पूर्णतया ज्ञान हो, उसे ब्रह्मविद्या कहते हैं; यह सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रय है॥ १॥