उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद् ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति॥ ७॥
भो:=हे गुरुदेव; उपनिषदम्=ब्रह्मसम्बन्धी रहस्यमयी विद्याका; ब्रूहि=उपदेश कीजिये; इति=इस प्रकार (शिष्यके प्रार्थना करनेपर गुरुदेव कहते हैं कि); ते=तुझको (हमने); उपनिषत्=रहस्यमयी ब्रह्मविद्या; उक्ता=बतला दी; ते=तुझको (हम); वाव=निश्चय ही; ब्राह्मीम्=ब्रह्मविषयक; उपनिषदम्=रहस्यमयी विद्या; अब्रूम=बतला चुके हैं; इति=इस प्रकार (तुम्हें समझना चाहिये)॥ ७॥
व्याख्या—गुरुदेवसे सांकेतिक भाषामें ब्रह्मविद्याका श्रेष्ठ उपदेश सुनकर शिष्य उसको पूर्णरूपसे हृदयङ्गम नहीं कर सका; इसलिये उसने प्रार्थना की कि ‘भगवन्! मुझे उपनषिद्—रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये।’ इसपर गुरुदेवने कहा—‘वत्स! हम तुम्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश कर चुके हैं।’ तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ से लेकर उपर्युक्त मन्त्रतक जो कुछ उपदेश किया है, तुम यह दृढ़रूपसे समझ लो कि वह सुनिश्चित रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका ही उपदेश है॥ ७॥
सम्बन्ध—ब्रह्मविद्याके सुननेमात्रसे ही ब्रह्मके स्वरूपका रहस्य समझमें नहीं आता, इसके लिये विशेष साधनोंकी आवश्यकता होती है; इसलिये अब उन प्रधान साधनोंका वर्णन करते हैं—