तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति॥ ४॥
तत्=उसके समीप; (अग्निदेव) अभ्यद्रवत्=दौड़कर गया; तम्=उस अग्निदेवसे; अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा; क: असि इति=(कि तुम) कौन हो; अब्रवीत्=(अग्निने) यह कहा (कि); अहम्=मैं; वै अग्नि:=प्रसिद्ध अग्निदेव; अस्मि इति=हूँ; (और) अहम् वै=मैं ही; जातवेदा:=जातवेदाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ४॥
व्याख्या—अग्निदेवताने सोचा, इसमें कौन बड़ी बात है; इसलिये वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हें अपने समीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा—आप कौन हैं? अग्निने सोचा—मेरे तेज:पुञ्ज स्वरूपको सभी पहचानते हैं, इसने कैसे नहीं जाना; अत: उन्होंने तमककर उत्तर दिया—‘मैं प्रसिद्ध अग्नि हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम जातवेदा है’॥ ४॥
सम्बन्ध—तब यक्षरूपी ब्रह्मने अग्निसे पूछा—