तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद् विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति॥ ३॥
ते=उन इन्द्रादि देवताओंने; अग्निम्=अग्निदेवसे; [इति=इस प्रकार;] अब्रुवन्=कहा; जातवेद:=हे जातवेदा; (आप जाकर) एतत्=इस बातको; विजानीहि=जानिये—इसका भलीभाँति पता लगाइये (कि); इदम् यक्षम्=यह दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; तथाइति=(अग्निने कहा—) बहुत अच्छा!॥ ३॥
व्याख्या—देवता उस अति विचित्र महाकाय दिव्य यक्षको देखकर मन-ही-मन सहम-से गये और उसका परिचय जाननेके लिये व्यग्र हो उठे। अग्निदेवता परम तेजस्वी हैं, वेदार्थके ज्ञाता हैं; समस्त जात-पदार्थोंका पता रखते हैं और सर्वज्ञ-से हैं। इसीसे उनका गौरवयुक्त नाम ‘जातवेदा’ है। देवताओंने इस कार्यके लिये अग्निको ही उपयुक्त समझा और उन्होंने कहा—‘हे जातवेदा! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।’ अग्निदेवताको अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था। अत: उन्होंने कहा—‘अच्छी बात है, अभी पता लगाता हूँ’॥ ३॥