तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति॥ २॥
ह तत्=प्रसिद्ध है कि उस परब्रह्मने; एषाम्=इन देवताओंके (अभिमानको); विजज्ञौ=जान लिया; (और कृपापूर्वक उनका अभिमान नष्ट करनेके लिये वह) तेभ्य:=उनके सामने; ह=ही; प्रादुर्बभूव=साकाररूपमें प्रकट हो गया; तत्=उसको (यक्षरूपमें प्रकट हुआ देखकर भी); इदम्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है, इस बातको; न व्यजानत=(देवताओंने) नहीं जाना॥ २॥
व्याख्या—देवताओंके मिथ्या अभिमानको करुणावरुणालय भगवान् समझ गये। भक्त-कल्याणकारी भगवान्ने सोचा कि यह अभिमान बना रहा तो इनका पतन हो जायगा। भक्त-सुहृद् भगवान् भक्तोंका पतन कैसे सह सकते थे। अत: देवताओंपर कृपा करके उनका दर्प चूर्ण करनेके लिये वे उनके सामने दिव्य साकार यक्षरूपमें प्रकट हो गये। देवता आश्चर्यचकित होकर उस अत्यन्त अद्भुत विशाल रूपको देखने और विचार करने लगे कि यह दिव्य यक्ष कौन है; पर वे उसको पहचान नहीं सके॥ २॥