सम्बन्ध—प्रथम प्रकरणमें ब्रह्मका स्वरूप-तत्त्व समझानेके लिये उसकी शक्तिका सांकेतिक भाषामें विभिन्न प्रकारसे दिग्दर्शन कराया गया। द्वितीय प्रकरणमें ब्रह्मज्ञानकी विलक्षणता बतलानेके लिये यह कहा गया कि प्रथम प्रकरणके वर्णनसे आपातत: ब्रह्मका जैसा स्वरूप समझमें आता है, वस्तुत: उसका पूर्णस्वरूप उतना ही नहीं है। वह तो उसकी महिमाका अंशमात्र है। जीवात्मा, मन, प्राण, इन्द्रिय आदि तथा उनके देवता—सभी उसीसे अनुप्राणित, प्रेरित और शक्तिमान् होकर कार्यक्षम होते हैं। अब इस तीसरे प्रकरणमें दृष्टान्तके द्वारा यह समझाया जाता है कि विश्वमें जो कोई भी प्राणी या पदार्थ शक्तिमान्, सुन्दर और प्रिय प्रतीत होते हैं, उनके जीवनमें जो सफलता दीखती है, वह सभी उस परब्रह्म परमेश्वरके एक अंशकी ही महिमा है (गीता १०। ४१)। इनपर यदि कोई अभिमान करता है तो वह बहुत बड़ी भूल करता है—
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति॥ १॥
ब्रह्म=परब्रह्म परमेश्वरने; ह=ही; देवेभ्य:=देवताओंके लिये (उनको निमित्त बनाकर); विजिग्ये=(असुरोंपर) विजय प्राप्त की; ह=किंतु; तस्य=उस; ब्रह्मण:=परब्रह्म पुरुषोत्तमकी; विजये=विजयमें; देवा:=इन्द्रादि देवताओंने; अमहीयन्त=अपनेमें महत्त्वका अभिमान कर लिया; ते=वे; इति=यों; ऐक्षन्त=समझने लगे (कि); अयम्=यह; अस्माकम् एव=हमारी ही; विजय:=विजय है; (और) अयम्=यह; अस्माकम् एव=हमारी ही; महिमा=महिमा है॥ १॥
व्याख्या—परब्रह्म पुरुषोत्तमने देवोंपर कृपा करके उन्हें शक्ति प्रदान की, जिससे उन्होंने असुरोंपर विजय प्राप्त कर ली। यह विजय वस्तुत: भगवान्की ही थी, देवता तो केवल निमित्तमात्र थे; परंतु इस ओर देवताओंका ध्यान नहीं गया और वे भगवान्की कृपाकी ओर लक्ष्य न करके भगवान्की महिमाको अपनी महिमा समझ बैठे और अभिमानवश यह मानने लगे कि हम बड़े भारी शक्तिशाली हैं एवं हमने अपने ही बल-पौरुषसे असुरोंको पराजित किया है॥ १॥