अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति। तथेति। तदभ्यद्रवत्। तस्मात् तिरोदधे॥ ११॥
अथ=तदनन्तर; इन्द्रम्=इन्द्रसे; अब्रुवन्=(देवताओंने) यह कहा; मघवन्=हे इन्द्रदेव!; एतत्=इस बातको; विजानीहि=आप जानिये—भलीभाँति पता लगाइये (कि); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; (तब इन्द्रने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा; तत् अभ्यद्रवत्=(और वे) उस यक्षकी ओर दौड़कर गये (परंतु वह दिव्य यक्ष); तस्मात्=उनके सामनेसे; तिरोदधे=अन्तर्धान हो गया॥ ११॥
व्याख्या—जब अग्नि और वायु-सरीखे अप्रतिमशक्ति और बुद्धिसम्पन्न देवता असफल होकर लौट आये और उन्होंने कोई कारण भी नहीं बताया, तब देवताओंने विचार करके स्वयं देवराज इन्द्रको इस कार्यके लिये चुना और उन्होंने कहा—‘हे महान् बलशाली देवराज! अब आप ही जाकर पूरा पता लगाइये कि यह यक्ष कौन है। आपके सिवा अन्य किसीके इस काममें सफल होनेकी सम्भावना नहीं है।’ इन्द्र ‘बहुत अच्छा’ कहकर तुरंत यक्षके पास गये; पर उनके यहाँ पहुँचते ही वह उनके सामनेसे अन्तर्धान हो गया। इन्द्रमें इन देवताओंसे अधिक अभिमान था; इसलिये ब्रह्मने उनको वार्तालापका अवसर नहीं दिया। परंतु इस एक दोषके अतिरिक्त अन्य सब प्रकारसे इन्द्र अधिकारी थे, अत: उन्हें ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान कराना आवश्यक समझकर इसीकी व्यवस्थाके लिये वे स्वयं अन्तर्धान हो गये॥ ११॥