यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राण: प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥9॥
यत्=जो; प्राणेन=प्राणके द्वारा; न प्राणिति=चेष्टायुक्त नहीं होता; [अपि तु=बल्कि;] येन=जिससे; प्राण:=प्राण; प्रणीयते=चेष्टायुक्त होता है; तत्=उसको; एव=ही; त्वम्=तू; ब्रह्म=ब्रह्म; विद्धि=जान; इदम् यत्=प्राणोंकी शक्तिसे चेष्टायुक्त दीखनेवाले जिस तत्त्व-समुदायकी; उपासते=(लोग) उपासना करते हैं; इदम्=यह; न=ब्रह्म नहीं है॥9॥
व्याख्या—प्राणके द्वारा जो कोई भी चेष्टायुक्त की जानेवाली वस्तु है, तथा प्राकृत प्राणसे अनुप्राणित जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर उससे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो प्राणका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है, वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है। इस मन्त्रमें ‘जिसकी प्रेरणासे प्राण विचरता है, वह कौन है?’ इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है।
सारांश यह कि प्राकृत मन तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं; अतएव उनको परब्रह्म परमेश्वर परात्पर पुरुषोत्तमका वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता। इसलिये उनकी उपासना भी परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना नहीं है। मन-बुद्धि आदिसे अतीत परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपको सांकेतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ गुरुने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक, प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है॥9॥