अव्यक्तात्तु पर: पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति॥ ८॥ *
* इसका विस्तार इसी उपनिषद्के १। ३। १०,११ में देखना चाहिये।
तु=परंतु; अव्यक्तात् =अव्यक्तसे (भी वह); व्यापक:=व्यापक; च=और; अलिङ्ग: एव=सर्वथा आकाररहित; पुरुष:=परमपुरुष; पर:=श्रेष्ठ है; यम्=जिसको; ज्ञात्वा=जानकर; जन्तु:=जीवात्मा; मुच्यते=मुक्त हो जाता है; च=और; अमृतत्वम्=अमृतस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको; गच्छति=प्राप्त हो जाता है॥ ८॥
व्याख्या—परंतु इस प्रकृतिसे भी इसके स्वामी परमपुरुष परमात्मा श्रेष्ठ हैं, जो निराकाररूपसे सर्वत्र व्यापक हैं (गीता ९। ४)। जिनको जानकर यह जीवात्मा प्रकृतिके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप परमानन्दको पा लेता है। अत: मनुष्यको चाहिये कि वह इस प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये इसके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी शरण ग्रहण करे। (गीता ७। १४) परमात्मा जब इस जीवपर दया करके मायाके परदेको हटा लेते हैं, तभी इसको उनकी प्राप्ति होती है। नहीं तो यह मूढ़ जीव सर्वदा अपने समीप रहते हुए भी उन परमेश्वरको पहचान नहीं पाता॥ ८॥