भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्य:।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चम:॥ ३॥ *
* इस भावका मन्त्र तै० उ० २। ८ के आरम्भमें आया है।
अस्य भयात् =इसीके भयसे; अग्नि: तपति=अग्नि तपता है; भयात् = (इसीके) भयसे; सूर्य: तपति=सूर्य तपता है; च=तथा; [अस्य] भयात् = इसीके भयसे; इन्द्र: वायु:=इन्द्र, वायु; च=और; पञ्चम: मृत्यु:=पाँचवें मृत्यु देवता; धावति=(अपने-अपने काममें) प्रवृत्त हो रहे हैं॥ ३॥
व्याख्या—सबपर शासन करनेवाले और सबको नियन्त्रणमें रखकर नियमानुसार चलानेवाले इन परमेश्वरके भयसे ही अग्नि तपता है, इन्हींके भयसे सूर्य तप रहा है, इन्हींके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब दौड़-दौड़कर जल आदि बरसाना, प्राणियोंको जीवन-शक्ति प्रदान करना, जीवोंके शरीरोंका अन्त करना आदि अपना-अपना काम सावधानीपूर्वक कर रहे हैं। सारांश यह कि इस जगत्में देवसमुदायके द्वारा सारे कार्य जो नियमितरूपसे सम्पन्न हो रहे हैं, वे इन सर्वशक्तिमान्, सर्वेश्वर, सबके शासक एवं नियन्ता परमेश्वरके अमोघ शासनसे ही हो रहे हैं॥ ३॥