मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा
विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्यु-
रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव॥ १८॥
अथ=इस प्रकार उपदेश सुननेके अनन्तर; नचिकेत:=नचिकेता; मृत्युप्रोक्ताम्=यमराजद्वारा बतलायी हुई; एताम्=इस; विद्याम्=विद्याको; च=और; कृत्स्नम्=सम्पूर्ण; योगविधिम्=योगकी विधिको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; विमृत्यु:=मृत्युसे रहित (और); विरज: [सन्]=सब प्रकारके विकारोंसे शून्य विशुद्ध होकर; ब्रह्मप्राप्त: अभूत् =ब्रह्मको प्राप्त हो गया; अन्य: अपि य:=दूसरा भी जो कोई; [इदम्] अध्यात्मम् एवंवित् =इस अध्यात्मविद्याको इसी प्रकार जाननेवाला है; [स: अपि एवम्] एव [भवति]=वह भी ऐसा ही हो जाता है अर्थात् मृत्यु और विकारोंसे रहित होकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ १८॥
व्याख्या—इस प्रकार यमराजके द्वारा उपदिष्ट समस्त विवेचनको श्रद्धापूर्वक सुननेके पश्चात् नचिकेता उनके द्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण विद्या और योगकी विधिको प्राप्त करके जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त, सब प्रकारके विकारोंसे रहित एवं सर्वथा विशुद्ध होकर परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो गया। दूसरा भी जो कोई इस अध्यात्मविद्याको इस प्रकार नचिकेताकी भाँति ठीक-ठीक जान लेता है और श्रद्धापूर्वक उसे धारण कर लेता है, वह भी नचिकेताकी भाँति सब विकारोंसे रहित तथा जन्म-मृत्युसे मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है॥ १८॥