यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थय:।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धॺनुशासनम्॥ १५॥
यदा=जब (इसको); हृदयस्य=हृदयकी; सर्वे=सम्पूर्ण; ग्रन्थय:=ग्रन्थियाँ; प्रभिद्यन्ते=भलीभाँति खुल जाती हैं; अथ=तब; मर्त्य:=वह मरणधर्मा मनुष्य; इह=इसी शरीरमें; अमृत:=अमर; भवति=हो जाता है; हि एतावत् =बस, इतना ही; अनुशासनम्=सनातन उपदेश है॥ १५॥
व्याख्या—जब साधकके हृदयकी अहंता-ममतारूप समस्त अज्ञान-ग्रन्थियाँ भलीभाँति कट जाती हैं, उसके सब प्रकारके संशय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उपर्युक्त उपदेशके अनुसार उसे यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि ‘परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं और वे निश्चय ही मिलते हैं’, तब वह इस शरीरमें रहते हुए ही परमात्माका साक्षात् करके अमर हो जाता है। बस, इतना ही वेदान्तका सनातन उपदेश है॥ १५॥
सम्बन्ध—अब मरनेके बाद होनेवाली जीवात्माकी गतिका वर्णन करते हैं—