यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहु: परमां गतिम्॥ १०॥
यदा=जब; मनसा सह=मनके सहित; पञ्च ज्ञानानि=पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ; अवतिष्ठन्ते=भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं; बुद्धि: च=और बुद्धि भी; न विचेष्टति=किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं करती; ताम्=उस स्थितिको; परमाम् गतिम् आहु:=(योगी) परमगति कहते हैं॥ १०॥
व्याख्या—योगाभ्यास करते-करते जब मनके सहित पाँचों इन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी एक परमात्माके स्वरूपमें इस प्रकार स्थित हो जाती है, जिससे उसको परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुका तनिक भी ज्ञान नहीं रहता, उससे कोई भी चेष्टा नहीं बनती, उस स्थितिको योगीगण परमगति—योगकी सर्वोत्तम स्थिति बतलाते हैं॥ १०॥