य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाण:।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥
तस्मिँल्लोका: श्रिता: सर्वे तदु नात्येति कश्चन।
एतद् वै तत्॥ ८॥
य: एष:=जो यह; कामम् कामम्=(जीवोंके कर्मानुसार) नाना प्रकारके भोगोंका; निर्मिमाण:=निर्माण करनेवाला; पुरुष:=परमपुरुष परमेश्वर; सुप्तेषु=(प्रलयकालमें सबके) सो जानेपर भी; जागर्ति=जागता रहता है; तत् एव=वही; शुक्रम्=परम विशुद्ध तत्त्व है; तत् ब्रह्म=वही ब्रह्म है; तत् एव=वही; अमृतम्=अमृत; उच्यते=कहलाता है; (तथा) तस्मिन्=उसीमें; सर्वे=सम्पूर्ण; लोका: श्रिता:=लोक आश्रय पाये हुए हैं; तत् कश्चन उ=उसे कोई भी; न अत्येति=अतिक्रमण नहीं कर सकता; एतत् वै=यही है; तत् =वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥ ८॥
व्याख्या—जीवात्माओंके कर्मानुसार उनके लिये नाना प्रकारके भोगोंका निर्माण करनेवाला तथा उनकी यथायोग्य व्यवस्था करनेवाला जो यह परमपुरुष परमेश्वर समस्त जीवोंके सो जानेपर अर्थात् प्रलयकालमें सबका ज्ञान लुप्त हो जानेपर भी अपनी महिमामें नित्य जागता रहता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप है, जिसका ज्ञान सदैव एकरस रहता है, कभी अधिक, न्यून या लुप्त नहीं होता, वही परम विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही परब्रह्म है; उसीको ज्ञानी महापुरुषोंके द्वारा प्राप्य परम अमृतस्वरूप परमानन्द कहा जाता है। ये सम्पूर्ण लोक उसीके आश्रित हैं। उसे कोई भी नहीं लाँघ सकता—कोई भी उसके नियमोंका अतिक्रमण नहीं कर सकता। सभी सदा सर्वदा एकमात्र उसीके शासनमें रहनेवाले और उसीके अधीन हैं। कोई भी उसकी महिमाका पार नहीं पा सकता। यही है वह ब्रह्म-तत्त्व जिसके विषयमें तुमने पूछा था॥ ८॥
सम्बन्ध—अब अग्निके दृष्टान्तसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी व्यापकता और निर्लेपताका वर्णन करते हैं—