तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा॥ १४॥
तत् =वह; अनिर्देश्यम्=अनिर्वचनीय; परमम्=परम; सुखम्=सुख; एतत् =यह (परमात्मा ही है); इति=यों; मन्यन्ते=(ज्ञानीजन) मानते हैं; तत् =उसको; कथम् नु=किस प्रकारसे; विजानीयाम्=मैं भलीभाँति समझूँ; किमु=क्या (वह); भाति=प्रकाशित होता है; वा=या; विभाति=अनुभवमें आता है॥ १४॥
व्याख्या—उस सनातन परम आनन्द और परम शान्तिको प्राप्त ज्ञानी महात्माजन ऐसा मानते हैं कि परब्रह्म पुरुषोत्तम ही वह अलौकिक सर्वोपरि आनन्द है, जिसका निर्देश मन-वाणीसे नहीं किया जा सकता। उस परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको मैं अपरोक्षरूपसे किस प्रकार जानूँ? क्या वह प्रत्यक्ष प्रकट होता है या अनुभवमें आता है? उसका ज्ञान किस प्रकारसे होता है?॥ १४॥
सम्बन्ध—नचिकेताके आन्तरिक भावको समझकर यमराजने कहा—