नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना-
मेको बहूनां यो विदधाति कामान्।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां शान्ति: शाश्वती नेतरेषाम्*॥ १३॥
* इसका पूर्वार्ध श्वेताश्वतरोपनिषद् ६। १३ में ठीक इसी प्रकार है और उत्तरार्ध ६। १२ से मिलता है।
य:=जो; नित्यानाम्=नित्योंका (भी); नित्य:=नित्य (है); चेतनानाम्= चेतनोंका (भी); चेतन:=चेतन है (और); एक: बहूनाम्=अकेला ही इन अनेक (जीवों) के; कामान्=कर्मफलभोगोंका; विदधाति=विधान करता है; तम् आत्मस्थम्=उस अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तम)-को; ये धीरा:=जो ज्ञानी; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वती शान्ति:=सदा अटल रहनेवाली शान्ति (प्राप्त होती है); इतरेषाम् न=दूसरोंको नहीं॥ १३॥
व्याख्या—जो समस्त नित्य चेतन आत्माओंके भी नित्य चेतन आत्मा हैं और जो स्वयं अकेले ही अनन्त जीवोंके भोगोंका उन-उनके कर्मानुसार विधान करते हैं, उन अपने अंदर रहनेवाले सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाली सनातनी परम शान्ति मिलती है, दूसरोंको नहीं॥ १३॥
सम्बन्ध—जिज्ञासु नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्तिके आनन्द और शान्तिकी महिमा सुनकर मन-ही-मन विचार करने लगा—