एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा य: करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ १२॥ *
* यह मन्त्र श्वेताश्वतरोपनिषद् ६। १२ से मिलता-जुलता है।
य:=जो; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तर्यामी; एक: वशी= अद्वितीय एवं सबको वशमें रखनेवाला (परमात्मा); एकम् रूपम्=(अपने) एक ही रूपको; बहुधा=बहुत प्रकारसे; करोति=बना लेता है, तम् आत्मस्थम्=उस अपने अंदर रहनेवाले (परमात्मा) को; ये धीरा:=जो ज्ञानी पुरुष; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वतम् सुखम्=सदा अटल रहनेवाला परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है); इतरेषाम् न=दूसरोंको नहीं॥ १२॥
व्याख्या—जो परमात्मा सदा सबके अन्तरात्मारूपसे स्थित हैं, जो अद्वितीय और सर्वथा स्वतन्त्र हैं, सम्पूर्ण जगत्में देव-मनुष्यादि सभीको सदा अपने वशमें रखते हैं, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वभुवनसमर्थ परमेश्वर अपने एक ही रूपको अपनी लीलासे बहुत प्रकारका बना लेते हैं। उन परमात्माको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर अपने अंदर स्थित देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाला—सनातन परमानन्द मिलता है, दूसरोंको नहीं॥ १२॥