वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ १०॥
यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्ट:=प्रविष्ट; एक: वायु:=एक (ही) वायु; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूप:=उनके समान रूपवाला-सा; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एक: [सन् अपि]=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूप:=उन्हींके जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहि:=और उनके बाहर भी है॥ १०॥
व्याख्या—एक ही वायु अव्यक्तरूपसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें व्याप्त है, तथापि व्यक्तमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके संयोगसे उन-उन वस्तुओंके अनुरूप गति और शक्तिवाला दिखायी देता है। उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमेश्वर एक होते हुए भी उन-उन प्राणियोंके सम्बन्धसे पृथक्-पृथक् शक्ति और गतिवाला दीखता है, किंतु वह उतना ही नहीं है, उन सबके बाहर भी अनन्त—असीम एवं विलक्षण रूपसे स्थित है (नवम मन्त्रकी व्याख्याके अनुसार इसे भी समझ लेना चाहिये)॥ १०॥
सम्बन्ध—इस मन्त्रमें सूर्यके दृष्टान्तसे परमात्माकी निर्लेपता दिखलाते हैं—