यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥ १५॥
यथा=(परंतु) जिस प्रकार; शुद्धे [उदके]=निर्मल जलमें; आसिक्तम्=(मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ; शुद्धम्=निर्मल; उदकम्=जल; तादृक् एव=वैसा ही; भवति=हो जाता है; एवम्=उसी प्रकार; गौतम=हे गौतमवंशी नचिकेता; विजानत:=(एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले; मुने:=मुनिका (संसारसे उपरत हुए महापुरुषका); आत्मा=आत्मा; भवति=(ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है॥ १५॥
व्याख्या—परंतु यही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है॥ १५॥