यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥ १०॥
यत् इह=जो परब्रह्म यहाँ (है); तत् एव अमुत्र=वही वहाँ (परलोकमें भी है); यत् अमुत्र=जो वहाँ (है); तत् अनु इह=वही यहाँ (इस लोकमें) भी है; स: मृत्यो:=वह मनुष्य मृत्युसे; मुत्युम्=मृत्युको (अर्थात् बारंबार जन्म-मरणको); आप्नोति=प्राप्त होता है; य:=जो; इह=इस जगत् में; नाना इव=(उस परमात्माको) अनेककी भाँति; पश्यति=देखता है॥ १०॥
व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, सर्वरूप, सबके परम कारण, परब्रह्म पुरुषोत्तम यहाँ इस पृथ्वीलोकमें हैं, वही वहाँ परलोकमें अर्थात् देव-गन्धर्वादि विभिन्न अनन्त लोकोंमें भी हैं; तथा जो वहाँ हैं, वे ही यहाँ भी हैं। एक ही परमात्मा अखिल ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं। जो उन एक ही परब्रह्मको लीलासे नाना नामों और रूपोंमें प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्वकी कल्पना करता है, उसे पुन:-पुन: मृत्युके अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म-मरणका चक्र सहज ही नहीं छूटता। अत: दृढ़तापूर्वक यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्तिके सहित नाना रूपोंमें प्रकट हैं और यह सारा जगत् बाहर-भीतर उन एक परमात्मासे ही व्याप्त होनेके कारण उन्हींका स्वरूप है॥ १०॥