यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्क: सदा शुचि:।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते॥ ८॥
तु य: सदा=परंतु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकशील बुद्धिसे युक्त; समनस्क:=संयतचित्त (और); शुचि:=पवित्र; भवति=रहता है; स: तु=वह तो; तत्पदम्=उस परमपदको; आप्नोति=प्राप्त कर लेता है; यस्मात् भूय:=जहाँसे (लौटकर) पुन:; न जायते=जन्म नहीं लेता॥ ८॥
व्याख्या—इसके विपरीत जो छठे मन्त्रके अनुसार स्वयं सावधान होकर अपनी बुद्धिको निरन्तर विवेकशील बनाये रखता है और उसके द्वारा मनको रोककर पवित्रभावमें स्थित रहता है अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा भगवान्की आज्ञाके अनुसार पवित्र कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता है तथा भगवान्को अर्पण किये हुए भोगोंका राग-द्वेषसे रहित हो निष्कामभावसे शरीर-निर्वाहके लिये उपभोग करता रहता है, वह परमेश्वरके उस परमधामको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे फिर लौटना नहीं होता॥ ८॥
सम्बन्ध—आठवें मन्त्रमें कही हुई बातको फिरसे स्पष्ट करते हुए रथके रूपकका उपसंहार करते हैं—