एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्रॺया बुद्धॺा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:॥ १२॥
एष: आत्मा=यह सबका आत्मरूप परमपुरुष; सर्वेषु भूतेषु=समस्त प्राणियोंमें रहता हुआ भी; गूढ:=मायाके परदेमें छिपा रहनेके कारण; न प्रकाशते=सबके प्रत्यक्ष नहीं होता; तु सूक्ष्मदर्शिभि:=केवल सूक्ष्मतत्त्वोंको समझनेवाले पुरुषोंद्वारा ही; सूक्ष्मया अग्रॺया बुद्धॺा=अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धिसे; दृश्यते=देखा जाता है॥ १२॥
व्याख्या—ये परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान् सबके अन्तर्यामी हैं, अत: सब प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं, परंतु अपनी मायाके परदेमें छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जाननेमें नहीं आते। जिन्होंने भगवान्का आश्रय लेकर अपनी बुद्धिको तीक्ष्ण बना लिया है, वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान्की दयासे सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं॥ १२॥
सम्बन्ध—विवेकशील मनुष्यको भगवान्के शरण होकर किस प्रकार भगवान्की प्राप्तिके लिये साधन करना चाहिये?—इस जिज्ञासापर कहते हैं—