न साम्पराय: प्रतिभाति बालं
प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी
पुन: पुनर्वशमापद्यते मे॥ ६॥
वित्तमोहेन मूढम्=इस प्रकार सम्पत्तिके मोहसे मोहित; प्रमाद्यन्तम् बालम्=निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको; साम्पराय:=परलोक; न प्रतिभाति=नहीं सूझता; अयम् लोक:=(वह समझता है) कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है; पर: न अस्ति=इसके सिवा दूसरा (स्वर्ग-नरक आदि लोक) कुछ भी नहीं है; इति मानी=इस प्रकार माननेवाला अभिमानी मनुष्य; पुन: पुन:=बार-बार; मे वशम्=मेरे (यमराजके) वशमें; आपद्यते=आता है॥ ६॥
व्याख्या—इस प्रकार मनुष्य-जीवनके महत्त्वको नहीं समझनेवाला अभिमानी मनुष्य सांसारिक भोग-सम्पत्तिकी प्राप्तिके साधनरूप धनादिके मोहसे मोहित हुआ रहता है; अतएव भोगोंमें आसक्त होकर वह प्रमादपूर्वक मनमाना आचरण करने लगता है। उसे परलोक नहीं सूझता। उसके अन्त:करणमें इस प्रकारके विचार उत्पन्न ही नहीं होते कि मरनेके बाद मुझे अपने समस्त कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य होकर बारम्बार विविध योनियोंमें जन्म लेना पड़ेगा। वह मूर्ख समझता है कि बस, जो कुछ यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है, यही लोक है। इसीकी सत्ता है। यहाँ जितना विषय-सुख भोग लिया जाय, उतनी ही बुद्धिमानी है। इसके आगे क्या है। परलोकको किसने देखा है। परलोक तो लोगोंकी कल्पनामात्र है इत्यादि। इस प्रकारकी मान्यता रखनेवाला मनुष्य बारम्बार यमराजके चंगुलमें पड़ता है और वे उसके कर्मानुसार उसे नाना योनियोंमें ढकेलते रहते हैं। उसके जन्म-मरणका चक्र नहीं छूटता॥ ६॥
सम्बन्ध—इस प्रकार विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खोंकी निन्दा करके अब उस आत्मतत्त्वकी और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करनेवाले पुरुषोंकी दुर्लभताका वर्णन करते हैं—