स त्वं प्रियान् प्रियरूपाॸश्च कामा-
नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षी:।
नैताॸ सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो
यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्या:॥ ३॥
नचिकेत:=हे नचिकेता! (उन्हीं मनुष्योंमें); स: त्वम्=तुम (ऐसे नि:स्पृह हो कि); प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और; प्रियरूपान्=अत्यन्त सुन्दर रूपवाले; कामान्=इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको; अभिध्यायन्=भलीभाँति सोच-समझकर; अत्यस्राक्षी:=(तुमने) छोड़ दिया; एताम् वित्तमयीम् सृङ्काम्=इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को; न अवाप्त:=(तुम) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे); यस्याम्=जिसमें; बहव: मनुष्या:=बहुत-से मनुष्य; मज्जन्ति=फँस जाते हैं॥ ३॥
व्याख्या—यमराज कहते हैं—‘हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो। अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमें फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामें तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया; इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया; परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अत: तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो॥ ३॥