नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहित:।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ २४॥
प्रज्ञानेन=सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा; अपि=भी; एनम्=इस परमात्माको; न दुश्चरितात् अविरत: आप्नुयात् =न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; न अशान्त:=न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; न असमाहित:=न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं; वा=और; न अशान्तमानस:[आप्नुयात् ]=न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है॥ २४॥
व्याख्या—जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे विरक्त होकर उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमें भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता, क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है; अत: वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता॥ २४॥
सम्बन्ध—उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता? इस जिज्ञासापर कहते हैं—