आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वत:।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति॥ २१॥
आसीन:=(वह परमेश्वर) बैठा हुआ ही; दूरम् व्रजति=दूर पहुँच जाता है; शयान:=सोता हुआ (भी); सर्वत: याति=सब ओर चलता रहता है; तम् मदामदम् देवम्=उस ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त न होनेवाले देवको; मदन्य: क:=मुझसे भिन्न दूसरा कौन; ज्ञातुम्=जाननेमें; अर्हति=समर्थ है॥ २१॥
व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा अचिन्त्यशक्ति हैं और विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं। एक ही समयमें उनमें विरुद्ध धर्मोंकी लीला होती है। इसीसे वे एक ही साथ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् बताये गये हैं। यहाँ यह कहते हैं कि वे परमेश्वर अपने नित्य परमधाममें विराजमान रहते हुए ही भक्ताधीनतावश उनकी पुकार सुनते ही दूर-से-दूर चले जाते हैं। परमधाममें निवास करनेवाले पार्षद भक्तोंकी दृष्टिमें वहाँ शयन करते हुए ही वे सब ओर चलते रहते हैं। अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं। उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं। वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं। इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्यस्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है। उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है॥ २१॥
सम्बन्ध—अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं—