अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतु: पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मन:॥ २०॥ *
* यह मन्त्र श्वेता० उ० (३। २०) में भी है।
अस्य=इस; जन्तो:=जीवात्माके; गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें; निहित:=रहनेवाला; आत्मा=परमात्मा; अणो: अणीयान्=सूक्ष्मसे अतिसूक्ष्म (और); महत: महीयान्=महान्से भी महान् है; आत्मन: तम् महिमानम्=परमात्माकी उस महिमाको; अक्रतु:=कामनारहित (और); वीतशोक:=चिन्तारहित (कोई विरला साधक); धातुप्रसादात् =सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही; पश्यति=देख पाता है॥ २०॥
व्याख्या—इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया है, उसीको इस मन्त्रमें ‘जन्तु’ नाम देकर उसकी बद्धावस्था व्यक्त की गयी है। भाव यह कि यद्यपि परब्रह्म पुरुषोत्तम उस जीवात्माके अत्यन्त समीप जहाँ यह स्वयं रहता है, वहीं हृदयमें छिपे हुए हैं तो भी यह उनकी ओर नहीं देखता। मोहवश भोगोंमें भूला रहता है। इसी कारण यह ‘जन्तु’ है—मनुष्य-शरीर पाकर भी कीट-पतङ्ग आदि तुच्छ प्राणियोंकी भाँति अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहा है। जो साधक पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार अपने-आपको नित्य चेतनस्वरूप समझकर सब प्रकारके भोगोंकी कामनासे रहित और शोकरहित हो जाता है, वह परमात्माकी कृपासे यह अनुभव करता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अणुसे भी अणु और महान्से भी महान्—सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार उनकी महिमाको समझकर उनका साक्षात्कार कर लेता है। (यहाँ ‘धातुप्रसादात्’ का अर्थ ‘परमेश्वरकी कृपा’ किया गया है। ‘धातु’ शब्दका अर्थ सर्वाधार परमात्मा माना गया है। विष्णुसहस्रनाममें भी ‘अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तम:’—‘धातु’ को भगवान्का एक नाम माना गया है)॥ २०॥