हन्ता चेन्मन्यते हन्तुॸ हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायॸ हन्ति न हन्यते॥ १९॥
चेत् =यदि कोई; हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति; हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ; मन्यते=मानता है (और); चेत्=यदि; हत:=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति; हतम्=अपनेको मारा गया; मन्यते=समझता है (तो); तौ उभौ=वे दोनों ही; नवजानीत:=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि); अयम्=यह आत्मा; न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और); न हन्यते=न मारा ही जाता है*॥ १९॥
* गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है—
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥ (२। १९)
‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है न किसीके द्वारा मारा जाता है।’
व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं; क्योंकि जबतक साधकको अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एवं वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे वैराग्य होकर उसके अन्त:करणमें नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती। उसको यह दृढ़ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है; अनित्य, विनाशी जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है; न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अत: यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते हैं, वे वस्तुत: आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये। वस्तुत: आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है।
साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंसे सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये॥ १८-१९॥
सम्बन्ध—इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्त:करणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—